मीरा: भक्ति का अमिरस – माणिक मुंडे

0
154
A book by Manik Munde

पद की पंक्ति है, ‘मीरा के प्रभु गिरधर नागर, बार-बार बलि जाऊं।’
मीरा कहती है, ‘मैं तो एक बार नहीं, बार-बार बलि जाना चाहती हूँ। बार-बार निछावर करना चाहती हूँ क्योंकि जितनी बार निछावर करती हूँ उतनी बार मोक्ष के द्वार खुलते हैं। जितनी बार निछावर करती हूँ उतनी बार स्वर्ग बरस जाता है। जितनी बार अपने को मिटाती हूँ उतनी बार अमृत की वर्षा होती है।
इसके पहले के चरण में उसने कहा है कि “वह जहाँ बिठा देता है वहाँ बैठ जाती हूँ; जहाँ से उठा देता है वहाँ से उठ जाती हूँ।” इस पूर्ण समर्पण के कारण ही मीरा मगन हो कर हरि गुण गा सकी। इस दशा तक पहुँचने से पहले जो भी गाया जाता है वह केवल तुकबंदी ही होती है।
मीरा ने उस परम दशा में गाया; उसे गाया कहना भी ठीक नहीं। उसने अपने को परमात्मा की मर्ज़ी पर ऐसा छोड दिया था कि वह गाए तो गाए; न गाए तो न गाए। मीरा तो बाँसुरी हो गयी थी। उस बाँसुरी से फिर जो स्यर निकले वे तो कृष्ण के ही थे।
उसकी मगनता और उसकी तल्लीनता एक परम दशा की अनुभूति है।
⚫मीरा: भक्ति का अमिरस🌑
♦चिंतन ग्रंथ ♦माणिक मुंडे

LEAVE A REPLY